पंजाब में किसान नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में सीकर में प्रदर्शन, सरकार की तानाशाही की आलोचना
पंजाब में किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल, सरवन सिंह पंढ़ेर, अभिमन्यु कोहाड़ समेत सैंकड़ों किसान नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के पूर्व पदाधिकारियों ने सीकर के कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन की अगुवाई मैलासी ग्राम इकाई के अध्यक्ष बीएल शर्मा ने किसान मसीहा बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का झंडा लेकर की। प्रदर्शनकारियों ने सभी गिरफ्तार किसान नेताओं की बिना शर्त रिहाई की मांग की और किसानों का रोष-पत्र राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के नाम जिला कलक्टर मुकुल शर्मा को सौंपा।
गिरफ्तारी का विरोध: किसान यूनियन (टिकैत) के पूर्व जिला अध्यक्ष दिनेश सिंह जाखड़ ने बताया कि 19 मार्च को चंडीगढ़ में केंद्र और पंजाब सरकार के मंत्रियों व अधिकारियों से किसानों की मांगों पर 7वें दौर की वार्ता के बाद मोर्चे पर लौट रहे किसान नेताओं को पंजाब पुलिस ने मोहाली में हिरासत में ले लिया। इसके अलावा, सैंकड़ों किसान नेताओं को पंजाब के विभिन्न स्थानों से गिरफ्तार किया गया। इस गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन हुआ।
ताहस-नहस की गई किसानों की संपत्ति: जाखड़ ने आरोप लगाया कि शंभू और खनोरी बॉर्डर पर किसानों के टैंट, ट्रैक्टर-ट्रॉलियां और अन्य सामान को जेसीबी और बुलडोजर से तहस-नहस किया गया, जिससे यह साबित होता है कि पंजाब सरकार की कार्यवाही लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ थी। उन्होंने इसे तानाशाही कार्यवाही करार दिया और इसे किसानों के खिलाफ धोखा और विश्वासघात बताया।
केंद्र और पंजाब सरकार पर निशाना: जाखड़ ने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को उद्योगपतियों के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार का बर्ताव उद्योगपतियों के प्रति तो अलग है, जबकि किसानों के प्रति यह पक्षपाती और नकारात्मक है। इस प्रकार की कार्यवाही लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है और सरकारें खुद आत्मघाती हो रही हैं।
किसान नेताओं का आक्रोश: प्रदर्शन के दौरान पूर्व जिला उपाध्यक्ष हरिराम मील, श्रवण लाल हरितवाल, धोद तहसील इकाई के पूर्व अध्यक्ष गिरधारी लाल रणवा, पूर्व जिला महासचिव जसबीर सिंह चौधरी समेत कई अन्य किसान नेता उपस्थित थे। सभी ने केंद्र और पंजाब सरकार के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया।
किसान नेताओं के खिलाफ की गई इस कार्रवाई के विरोध में प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो किसानों की आवाज को दबाने के लिए उठाया गया कदम है।