बैसाखी से पहले ‘खालिस्तान जिंदाबाद रैली’ की घोषणा से पंजाब में हलचल,

सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व में मानसा से तलवंडी साबो तक निकाली जाएगी रैली
पंजाब में बैसाखी से एक दिन पहले एक बार फिर ‘खालिस्तान’ मुद्दा सियासी और सुरक्षा हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है। शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) की ओर से 13 अप्रैल को ‘खालिस्तान जिंदाबाद रैली’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसकी अगुवाई पार्टी अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान स्वयं करेंगे। यह रैली मानसा से तलवंडी साबो तक निकाली जाएगी, जहां बैसाखी के मौके पर हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
गृह मंत्रालय की चेतावनी के बावजूद अडिग रुख
यह रैली ऐसे समय में घोषित की गई है जब हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खालिस्तान समर्थक बयानों को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए चेतावनी दी थी कि ऐसे तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। बावजूद इसके, अकाली दल (अमृतसर) के नेता सीरा ढिल्लों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी खालिस्तान का मुद्दा उठाना जारी रखेगी।
ढिल्लों का बयान था—
“हम अपने अधिकारों और सिखों की आज़ादी की बात कर रहे हैं। केंद्र सरकार की धमकियों से डरने वाले नहीं। खालिस्तान का मुद्दा हमारा वैचारिक और संवैधानिक अधिकार है।”
प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क
अब तक रैली का समय और सटीक मार्ग स्पष्ट नहीं किया गया है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है। चूंकि तलवंडी साबो में बैसाखी के दिन हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं, ऐसे में किसी भी उकसाने वाले भाषण या विरोध प्रदर्शन से हालात बिगड़ने की आशंका बनी हुई है।
राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने केंद्र सरकार के निर्देश पर निगरानी तेज कर दी है। सीमावर्ती जिलों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक समीकरण और अंदरूनी चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सिमरनजीत सिंह मान इस रैली के जरिए न केवल अपनी वैचारिक स्थिति को दोहराना चाहते हैं, बल्कि अपने dwindling समर्थन आधार को फिर से सक्रिय करने की कोशिश भी कर रहे हैं।
विशेष रूप से तब, जब खुद को खालिस्तान समर्थक कहने वाले अमृतपाल सिंह ने संसद सदस्य बनने के बाद अपनी नई पार्टी बना ली है, जिससे मान के नेतृत्व और प्रभाव को सीधी चुनौती मिली है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार—
“SAD (अमृतसर) को अभी तक कोई संवैधानिक मान्यता या सत्ता में भागीदारी नहीं मिली है। ऐसे में यह रैली केवल वैचारिक प्रदर्शन भर नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई भी बन गई है।”










