पटियाला: झिल गांव के किसानों ने अमरूद की खेती से बदली किस्मत, गेहूं-धान की जगह अब दोगुना मुनाफा

पटियाला: झिल गांव के किसानों ने अमरूद की खेती से बदली किस्मत, गेहूं-धान की जगह अब दोगुना मुनाफा

रविंदर सिंह अपने बाग में अमरूद के पौधों के साथ। - Dainik Bhaskar
भूजल संकट और बढ़ते खर्च के बीच नवाचार की मिसाल बने किसान मलविंदर और रविंदर सिंह, 25 एकड़ में कर रहे सफल बागवानी

पटियाला, पंजाब:
विटामिन सी, बी, कैल्शियम, आयरन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्वों से भरपूर अमरूद, न केवल सेहत के लिए फायदेमंद है, बल्कि किसानों के लिए भी कमाई का बेहतरीन जरिया बनकर उभरा है। पंजाब के पटियाला जिले के झिल गांव के दो भाई मलविंदर सिंह माली और रविंदर सिंह बिट्टू ने गेहूं-धान के पारंपरिक खेती चक्र से बाहर निकलकर 25 एकड़ में अमरूद की खेती शुरू की है — और आज वे इससे दोगुना मुनाफा कमा रहे हैं।

पारंपरिक खेती से आधुनिक बागवानी की ओर

झिल गांव के इन दोनों भाइयों के पास कुल 60 एकड़ जमीन है और ये संयुक्त परिवार के 11 सदस्यों के साथ रहते हैं। पहले ये गेहूं और धान की खेती करते थे, जिससे प्रति एकड़ 40-50 हजार रुपए की कमाई होती थी। लेकिन अब अमरूद की खेती से ये प्रति एकड़ एक लाख रुपए तक कमा रहे हैं।

रविंदर सिंह बताते हैं, “हमारा परिवार 1947 में देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से आया था। हमारे बुजुर्ग वहां अमरूद की खेती करते थे। यहां आने के बाद गेहूं और धान की खेती शुरू की, लेकिन बीते कुछ वर्षों में गिरते भूजल स्तर और ट्यूबवेल पर बढ़ते खर्च को देखकर हमने फिर से अमरूद की तरफ रुख किया।”

पर्यावरण के अनुकूल और लाभकारी विकल्प

दोनों भाइयों ने बताया कि धान की खेती में जहां ट्यूबवेल की लागत 2.5 से 3 लाख रुपए तक पहुंच जाती है, वहीं अमरूद की खेती में पानी की खपत कम है, और देखरेख भी अपेक्षाकृत सरल है। साथ ही, बाजार में इसकी मांग स्थिर और दाम अच्छे मिलते हैं।

देश-दुनिया में हो रही अमरूद की बढ़ती खेती

अमरूद की खेती भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर होती है। वैश्विक स्तर पर इंडोनेशिया, चीन और पाकिस्तान भी इसके प्रमुख उत्पादक देश हैं। अब पंजाब जैसे राज्य में भी इसकी खेती को अपनाया जाना, खेती के सतत और लाभकारी मॉडल की ओर एक मजबूत कदम है।

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