भागलपुर. बिहार अपनी परंपरागत खेती के साथ नयी किस्म की खेती और नये तौर तरीके अपना चुका है. मक्का के लिए मशहूर इलाके में अब मौसमी फल रही है. भागलपुर का नवगछिया इलाका इतनी मौसमी पैदा कर रहा है कि यहां से माल बंगाल तक सप्लाई किया जा रहा है.
बिहार कृषि क्षेत्र में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और नए आयाम गढ़ रहा है. यहां के किसान नयी किस्म की फसल लगा रहे हैं. यहां गेहूं, मक्का, और सब्जी के साथ फल की भी खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है. खासकर भागलपुर जिले का नवगछिया मकलांचल यानी मक्के की खेती के नाम से जाना जाता है. यहां पर सबसे अधिक मक्के की खेती होती है. लेकिन धीरे-धीरे यहां के किसान कुछ अलग करने की चाहत लेकर और मौसमी की खेती पर जोर दे रहे हैं.
बिहार की मौसमी बंगाल में
सबसे पहले यहां मौसमी की खेती नवगछिया के तेतरी में रहने वाले किसान गोपाल सिंह ने शुरू की थी. आज वो 5 एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं और फसल खूब भर कर आयी है. उन्हें देखकर नवगछिया के कई किसानों ने मौसमी की खेती शुरू कर दी. आज हालात ये हैं कि नवगछिया की मौसमी बिहार से निकल कर पश्चिम बंगाल तक पहुंच गयी है. किसानों को इससे अच्छी खासी आमदनी हो रही है.
दोमट मिट्टी में मौसमी
किसान गोपाल सिंह ने लोकल 18 को बताया मौसमी की खेती दोमट मिट्टी में भी की जा सकती है. मौसमी को मटियार में भी लगाया जा सकता है. संतरा के वनिस्पत यहां की मिट्टी में इसकी खेती सफल है. वो पिछले 10 वर्षों से इसकी खेती करते आ रहे हैं. 15 एकड़ में इसकी खेती कर रहे थे, लेकिन इंटर क्रॉपिंग की वजह से अब 5 एकड़ में कर रहे हैं. उन्होंने बताया मौसमी में प्रति एकड़ 3 से 4 लाख की बचत होती है. अगर इसका बाजार सही समय पर मिल जाए तो मुनाफा और अधिक होगा. समय पर इसका बाजार यहां नहीं मिल पाता. लोकल बाजार में बाहर से लाकर इसकी आपूर्ति कर दी जाती है. यहां की मौसमी सिलीगुड़ी तक जाती है.
बिहार की जलवायु मौसमी के लिए अनुकूल
किसान गोपाल सिंह ने लोकल 18 को बताया मौसमी की प्लॉटिंग अगस्त में शुरू हो जाती है. वो नागपुर से इसका पौधा मंगवाते हैं. वहां इसकी अच्छी-खासी खेती होती है. नागपुर में आसानी से इसका पौधा उपलब्ध हो जाता है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की वैज्ञानिक ममता कुमारी ने बताया बिहार में संतरा से अधिक मौसमी की खेती सफल है, क्योंकि यहां तापमान अधिक रहता है. अधिक तापमान के कारण संतरे का रस सूख जाता है, लेकिन मौसमी के साथ ऐसा कुछ नहीं है. इसकी खेती सफल और इसमें रोग लगने की आशंका कम रहती है.
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FIRST PUBLISHED : May 1, 2024, 20:51 IST










