लुधियाना उपचुनाव के बाद कांग्रेस में बढ़ी कलह — विरोधियों की घर वापसी पर वड़िंग का सख्त ऐतराज़
लुधियाना, 2 जुलाई 2025 — पंजाब कांग्रेस में हाल ही में हुए लुधियाना पश्चिम विधानसभा उपचुनाव के बाद आंतरिक खींचतान और गुटबाज़ी एक बार फिर सतह पर आ गई है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PPCC) ने दो ऐसे नेताओं की पार्टी में पुनः एंट्री को खारिज कर दिया है, जिन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी का खुलकर विरोध किया था।
वड़िंग की नाराज़गी और स्पष्ट रुख
प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने स्पष्ट किया है कि कमलजीत सिंह कड़वल (आत्म नगर) और करण वड़िंग (दाखा) को पार्टी में फिर से शामिल करने का फैसला स्वीकार्य नहीं है। दोनों नेताओं ने 2024 के आम चुनाव में वड़िंग के खिलाफ प्रचार किया था, जब वे खुद लुधियाना से लोकसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार थे और उन्होंने जीत हासिल की थी।
वड़िंग ने मीडिया से कहा, “ये नेता पार्टी के प्राथमिक सदस्य तक नहीं थे, और जब पार्टी ने मुझ पर भरोसा कर टिकट दिया था, तब इन्होंने विरोध कर पार्टी लाइन के खिलाफ काम किया। अब उनका लौटना उन सैकड़ों कर्मठ कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय होगा, जो पूरी निष्ठा से पार्टी के लिए मैदान में डटे रहे।”
राणा गुरजीत और चरणजीत चन्नी पर भी सवाल
इस विवाद ने पार्टी के भीतर गुटबाज़ी और शक्ति संघर्ष को भी उजागर किया है। वड़िंग खेमा कपूरथला के विधायक राणा गुरजीत सिंह को इन नेताओं की वापसी के पीछे का सूत्रधार मानता है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, जो कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य हैं, ने भी इस फैसले का समर्थन किया था।
सीडब्ल्यूसी, कांग्रेस की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, और चन्नी का पक्ष खुलकर राणा गुरजीत के साथ आने से यह मामला और भी राजनीतिक रूप से पेचीदा हो गया है।
उपचुनाव में हार के बाद उभरी अंतर्कलह
लुधियाना पश्चिम उपचुनाव में कांग्रेस की हार के बाद संगठन में असंतोष और आंतरिक मतभेद सामने आ रहे हैं। पार्टी के भीतर अब यह बहस तेज हो गई है कि “वफादारों को प्राथमिकता मिले या वापसी करने वाले विरोधियों को मौका?” वड़िंग का यह रुख फिलहाल साफ संकेत है कि वह संगठन में अनुशासन और जवाबदेही को कमजोर नहीं होने देना चाहते।
आगे क्या?
राज्य कांग्रेस में इस मुद्दे ने भविष्य की रणनीति और पार्टी के भीतर नेतृत्व की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वड़िंग की लोकप्रियता और उनके संगठनात्मक कड़े फैसले उन्हें हाईकमान के करीबी बनाए रखते हैं, लेकिन पार्टी में अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ सामंजस्य बनाए रखना भी जरूरी होगा।