1971 के युद्ध का वीर योद्धा: नायक कमलजीत सिंह की शहादत और सिंबल पोस्ट की वीरगाथा

अमृतसर/पठानकोट: जब 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी, तब पंजाब के पठानकोट ज़िले की सिंबल पोस्ट भारत-पाक सीमा पर युद्ध का एक अहम मोर्चा बन गई। इस पोस्ट को बचाने के लिए बीएसएफ के नायक कमलजीत सिंह ने ऐसा साहस दिखाया, जो इतिहास में अमर हो गया।
4 दिसंबर 1971: जब अकेला सिपाही एक पोस्ट की ढाल बन गया
साल 1971 के युद्ध में 4 दिसंबर को पाकिस्तान की ओर से पठानकोट की सीमा पर स्थित सिंबल पोस्ट पर जबरदस्त हमला किया गया। उस समय 20वीं बटालियन बीएसएफ के रेडियो ऑपरेटर नायक कमलजीत सिंह वहां ड्यूटी पर थे। भारी गोलाबारी के बीच उन्होंने हमले की सूचना अपने साथियों तक पहुंचाई।
हालात इतने विकट थे कि बाकी जवानों ने पीछे हटने का निर्णय लिया, लेकिन कमलजीत ने पोस्ट छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा –
“आपको जाना है तो जाइए, मैं अपनी पोस्ट पर कब्जा नहीं होने दूंगा।”
कम गोला-बारूद, मगर अडिग हौसला
नायक कमलजीत कम संख्या और सीमित संसाधनों के बावजूद पाकिस्तानी सेना से भिड़ गए। वह अंत तक अकेले लड़ते रहे। अंततः पाक सेना के सैकड़ों सैनिकों ने उन्हें घेरकर गिरफ्तार कर लिया।
पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बरता यहीं नहीं रुकी। उन्होंने नायक कमलजीत का सिर कलम कर दिया और उसका प्रदर्शन सिंबल पोस्ट के पास एक बेर के पेड़ पर किया, साथ ही बोर्ड पर लिखा –
“ये रहा हमारा भारत की BSF को तोहफा”।
7 दिसंबर को भारत का जवाब: पोस्ट फिर से हासिल
नायक कमलजीत की शहादत ने सेना और बीएसएफ को झकझोर दिया। 7 दिसंबर को एक संयुक्त ऑपरेशन में भारतीय सेना और बीएसएफ ने पाकिस्तानियों को खदेड़ते हुए सिंबल पोस्ट को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। कमलजीत सिंह का पार्थिव शरीर भी दुश्मन से छुड़ाया गया, जिससे उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जा सके।
कौन थे नायक कमलजीत सिंह?
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जन्म: 18 जुलाई 1945, अमृतसर, पंजाब
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माता-पिता: करतार कौर और बहादुर सिंह
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शिक्षा: सरकारी हाई स्कूल, अमृतसर से 10वीं पास
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सेवा: BSF की 20वीं बटालियन में रेडियो ऑपरेटर के तौर पर भर्ती
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शहादत: 4 दिसंबर 1971, पठानकोट की सिंबल पोस्ट पर










