उत्तराखंड के इस जिले में है हेक्सागन आकार में बना अनोखा घंटाघर, शीर्ष पर लगी 6 घड़ियां देती है अलग लुक

हिना आज़मी/ देहरादून. जब बात उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की होती है तो हमारे मन में सबसे पहले घंटाघर की तस्वीर आती है. एशिया के इस अनोखे घंटाघर के शीर्ष पर 6 घड़ियां लगी हुई है. आमतौर पर किसी भी घंटाघर पर 4 घड़ियां लगी होती है. जिस तरह से अपनी पत्नी मुमताज के लिए शाहजहां ने उनकी याद में ताजमहल बनवाया था उसी तरह बलबीर सिंह के बेटे आनंद सिंह ने अपने पिता की याद में इसे साल 1948 में बनवाया था. इसका शिलान्यास तात्कालिक राज्यपाल सरोजिनी नायडू ने किया था.

देहरादून के इतिहासकार डॉ. लोकेश ओरही ने लोकल 18 को बताया कि जब देश को आजादी मिली थी तब इस आजादी को यादगार बनाने के लिए इस घंटाघर को बनाया गया. जिसके लिए जस्टिस बलबीर सिंह के बेटे आनंद सिंह ने जमीन दान की थी. इस अनोखे घंटाघर की नींव 1948 में में रखी गई थी. जिसका शिलान्यास करने के लिए सरोजिनी नायडू यहां आई थी. इसे बनने में 5 साल का वक्त लगा और यह 1953 में बनकर तैयार हुआ, जिसका लोकार्पण देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था. लाल बहादुर शास्त्री ने ने कहा कि यह घंटाघर उत्कृष्ट कला का एक नमूना है. हेक्सागन आकार में होने के कारण यह दुनिया में अनोखे प्रकार का घंटाघर माना जाता है. इसके अलावा घंटाघर आर्ट डेको डिज़ाइन शैली में बनाया गया था जो उस वक्त की प्रसिद्ध शैली थी.

क्यों कहा जाता है इस घंटाघर को हार्ट ऑफ द सिटी’
डॉ. लोकेश ओरही ने बताया कि इस घंटाघर को ‘हार्ट ऑफ द सिटी’ कहा जाता है क्योंकि यह मसूरी, आईएसबीटी, प्रेमनगर और रायपुर समेत सभी जगहों को जोड़ता है. शहर के बीचों-बीच होने के कारण यह देहरादून की पहचान बन गया है. उन्होंने बताया कि इसमें लगाने के लिए इंग्लैंड से घड़ियां मंगवाई गई थी. लेकिन अब खराब होने के चलते उसे उतारकर दूसरी घड़ियां वहां लगाई गई हैं.

बेहद मुश्किल था घंटाघर का निर्माण
डॉ. लोकेश ओरही ने बताया कि इस घंटाघर का निर्माण करना इतना आसान नहीं था. शहर के रईसों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के करण कोई भी रईस इससे बनने नहीं देना चाहता था. इसके अलावा निर्माण में भूमि के स्वामित्व और ठेकेदार की कोटेशन, तांगा चालकों के विवाद घंटाघर के निर्माण बाधा बने थे.

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