मानसून ने दी दस्तक, नालियों में कूड़ा करकट… प्रशासन की पोल खोल रहीं ये तस्वीरें

हिना आज़मी/ देहरादून: उत्तराखंड में मानसून दस्तक दे चुका है. ऐसे में नगर निगम और जिला प्रशासन दावे कर रहा है कि नालियों और सीवरेज की सफाई का काम जोरों- शोरों से चल रहा है. लेकिन, देहरादून के क़ई इलाकों की नालियां पूरी तरह से बंद और उनमें कूड़ा- करकट जमा हो रहा है. जमा हुए पानी की इस नालियों में बदबू के साथ मच्छर भी पनपने की संभावना है. निगम और जिला प्रशासन के दावे फेल नजर आ रहे हैं.

देहरादून के वार्ड नंबर 89 मेंहुवाला के चंदाताल निवासी रूपचंद ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए कहा है कि उनके क्षेत्र में मुख्य सड़क की यह नाली बन तो गई है. लेकिन, इसकी निकासी नहीं हो पाती है. क्योंकि सड़क पर आगे से ऊंचा ढाल है, जिससे पानी ऊपर नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि हम 25 सालों से देख रहे हैं यह नाली दुरुस्त हो ही नहीं पाई. सीमेंट की नाली ऐसी बनाई गई कि वह टूटकर नाले में ही गिर गई. उन्होंने कहा कि पहले यह सारा पानी नजदीक के प्लॉट में चला जाता था. बारिश होने पर वह लोगों के घरों में घुसता था. लेकिन अब जमीन के मालिक के भरान करने से पानी को निकालने का कहीं से रास्ता नहीं मिल पा रहा है. इससे नाली का पानी जमा हुआ है. इसमें कूड़ा- कचरा भी अटका पड़ा है, जिसकी सफाई नहीं हो पा रही है. पिछले एक महीने से नगर निगम के कर्मी भी नजर नहीं आ रहे हैं.

हर जगह एक जैसा हाल
देहरादून के वार्ड नंबर 89 का ही नहीं, बल्कि दून के पलटन बाजार, प्रेमनगर, टर्नर रोड, खुड़बुड़ा, डालनवाला के कुछ इलाकों के भी यही हालात है. देहरादून के खुड़बुड़ा इलाके में तो नालों के पास बसे घरों के लोग खिड़की भी नहीं खोल पाते हैं. यहां से गुजरने वाले राहगीर बदबू से बेहाल हो जाते हैं. हल्की सी बारिश होते ही पानी नाली से ऊपर सड़कों पर आ जाता है. पलटन बाजार के व्यापारियों को हर साल बरसात में वॉटर लॉगिंग के चलते बहुत मुसीबत का सामना करना पड़ता है. जब उनकी दुकानों में पानी भर जाता है.

लोगों की सहभागिता भी जरूरी
नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ अविनाश खन्ना ने कहा कि देहरादून में नालों के आसपास करीब एक लाख लोग रहते हैं, जिनमें से क़ई लोग कूड़ा गाड़ी की बजाय नाले में ही अपना कूड़ा- कचरा डाल देते हैं. लोगों को जागरूक करने के लिए लगातार अभियान भी चलाया जाता है. मानसून से पहले ही निगम की टीमें तमाम वार्डों में सफाई में जुट गई हैं. इसके अलावा शिकायतें मिलते ही सफाई कर्मी उस स्थान पर जाकर सफाई करते हैं.

खुद को बदलने से सुधर सकते हैं हालात
अब सवाल यह उठता है कि शहर की नालियों की व्यवस्था को सुधारने के लिए देहरादून नगर निगम की नींद मॉनसून आने से थोड़ी पहले ही क्यों खुलती है. इससे पहले सफाई क्यों नहीं की जाती है. इसी के साथ ही लोग प्रशासन के ऊपर ही जिम्मा क्यों सौंप देते हैंय क्यों नदी- नालों और नालियों में 50-70 रुपये बचाने के लिए कूड़ा डालते हैं. क्या राजधानी के नागरिकों की अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है. अगर इन बातों पर गौर किया जाए और निगम भी तत्परता से काम करे, तो राजधानी की ऐसी तस्वीरें शायद आपको दिखाई न दें.

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