कब्रिस्तान के आसपास मिलता है देवताओं का ये खास पेड़, हजारों साल तक रहती है उम्र

तनुज पाण्डे /नैनीताल: हमारी प्रकृति में कई ऐसे पेड़ पौधे हैं जो बेहद खास होने के साथ ही हमारे धर्म, रीति रिवाज से जुड़े हुए हैं. ऐसा ही एक पेड़ सुरई है, जो उच्च हिमालयी इलाकों में पाया जाता है. इस पेड़ को लेकर कहा जाता है कि बेहद सुंदर शंकुधारी होने के कारण यह देवताओं को बेहद प्रिय है. यही वजह है कि इस पेड़ से नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं. साथ ही यह एयर प्यूरीफायर का काम भी करता है.

नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर ललित तिवारी ने लोकल 18 से खास बातचीत के दौरान बताया कि सुरई सदाबहार वृक्ष है. यह 40 मीटर तक ऊंचा होता है. इसे साइप्रस भी कहा जाता है, जो वेस्ट नॉर्थ अमेरिका, मिड अमेरिका, साउथ चाइना और उच्च हिमालयी इलाकों में पाया जाता है. अमेरिका में इस पेड़ की खेती होती है. उन्होंने बताया की इस पेड़ को हिमालयन साइप्रस, भूटान साइप्रस के नाम से भी जाना जाता है.

कब्रिस्तान के आसपास ज्यादा मिलते हैं ये पेड़
प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि हिन्दू धर्म में इस पेड़ को बेहद पवित्र माना गया है. साथ ही पहाड़ों में ज्यादातर ये पेड़ कब्रिस्तान के आस पास मिलते हैं. ऐसा माना जाता है कि इन पेड़ों की सहायता से मृतकों की आत्मा को शांति मिलती है. इसमें देवताओं का वास है. यह पेड़ 1000 सालों तक जीवित रहता है. पर ईरान में एक सुरई का पेड़ ऐसा भी है, जो पिछले 4000 वर्ष से जीवित है.

औषधीय तौर पर भी किया जाता है प्रयोग
प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि सुरई का पेड़ कई तरह से औषधीय तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है. बाजार में साइप्रस का तेल मिलता है जो त्वचा के लिए बेहद लाभदायक है. साथ ही इस पेड़ की पत्तियों को पीसकर पेस्ट को लगाने से सूजन में आराम मिलता है. यह बायो एनर्जी का स्रोत भी है. इसके अलावा इसका तेल सिर दर्द, खांसी में पारंपरिक रूप से काम करता है. इसके अलावा इसके तेल का उपयोग आयुर्वेद में अरोमा थेरेपी में भी काम आता है. नैनीताल में सुरई का पेड़ नयनापीक के इलाके में बहुतायत में मिलता है.

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