पंजाब बाढ़ त्रासदी: “जिंदगी नरक बन गई है”, जिंदबड़ी गांव के प्रेम सैनी की मार्मिक व्यथा
भाखड़ा डैम से छोड़े गए पानी और भारी बारिश ने तबाह की ज़िंदगियाँ, सैकड़ों परिवार अब भी संघर्ष में
रूपनगर (रोपड़), पंजाब: 22-23 अगस्त की रात को हुई मूसलधार बारिश और भाखड़ा डैम से छोड़े गए पानी ने रूपनगर जिले के कई गांवों में तबाही मचा दी। गांव जिंदबड़ी के निवासी प्रेम सैनी की दर्दभरी कहानी इस आपदा की भयावहता को बयां करती है।
प्रेम सैनी बताते हैं, “हमें पहले ही सूचना थी कि डैम से पानी छोड़ा जाएगा, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि पानी हमारे घर तक आ जाएगा। आधी रात को पानी घर में घुस आया। सामान तैरने लगा, और मिट्टी भरे तेज बहाव में सब कुछ बहता चला गया। बच्चों को साथ लेकर जैसे-तैसे जान बचाकर भागे।”
जब दो दिन बाद पानी थोड़ा उतरा, तो प्रेम अपने घर लौटे। वहां जो देखा, उससे उनका दिल टूट गया—सारा घरेलू सामान खराब, दुकान का माल नष्ट, पोल्ट्री फार्म की सभी मुर्गियों की मौत और तीन कनाल जमीन बह चुकी थी। अब भी उनके घर के सामने 3 से 4 फुट गहरा पानी बह रहा है। उन्होंने कहा, “पत्नी डिप्रेशन में है। नींद नहीं आती, पूरी रात जागकर गुजारते हैं। जिंदगी नरक सी बन गई है।”
सिर्फ प्रेम सैनी ही नहीं, उनके गांव जिंदबड़ी के अलावा भनाम, प्लासी सिंघपुर, बेला रामगढ़ और पत्ती टेक सिंह जैसे गांवों के 1000 से ज्यादा परिवार भी इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं।
इन इलाकों का शहर से संपर्क लगभग 15 दिनों से पूरी तरह कटा हुआ है। पट्टी दुलचियां, पट्टी जीवन सिंह और हरसा बेला जैसे गांव आज भी जलमग्न हैं। वहां नाव ही एकमात्र सहारा बन चुकी है। कई धार्मिक स्थलों तक में सतलुज का पानी 3-4 फुट की ऊंचाई तक तेज बहाव में बह रहा है। घरों के आंगनों तक पानी भरा है, न छत है न भोजन, और लोगों के हाथ-पैर तक गल चुके हैं।
प्रभावित परिवारों की एक ही पुकार है — “सरकार को तुरंत मुआवजा देना चाहिए।” ग्रामीणों के अनुसार, 1988 के बाद यह सबसे भयावह स्थिति है, जिसमें न केवल आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी भारी चोट पहुंची है।
यह संकट केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक सतर्कता और तत्काल राहत प्रयासों की भी कड़ी परीक्षा है। जरूरत है कि राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर त्वरित राहत, पुनर्वास और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएं ताकि बर्बाद हो चुकी ज़िंदगियों को फिर से संजोया जा सके।