कमल किशोर पिमोली/ श्रीनगर गढ़वाल. उत्तराखंड में एक ऐसा मेला भी है, जहां काठ के घोड़े पर विशेष जाति के व्यक्ति को बैठाकर एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी रस्सी के सहारे फेंका जाता है. इसके पीछे स्थानीय लोगों की मान्यतायें जुड़ी हुई हैं. हालांकि बदलते वक्त के साथ परंपरा में भी कुछ बदलाव आया है. लेकिन आज भी ग्रामीण दैवीय आपदा या फिर कष्टों से मुक्त रहने के लिए इस परंपरा को निभाते हैं. इस मेले को बद्वी मेले के नाम से भी जाना जाता है. प्रत्येक वर्ष वैशाख महीने में यहां यह मेला आयोजित किया जाता है.
उत्तराखंड के पौड़ी जिलें के खिर्सू क्षेत्र में हर साल बद्धी मेले का आयोजन किया जाता है. जिसमें बड़ी संख्या में क्षेत्रवासियों के साथ अन्य जगहों से भी लोग पहुंचते हैं. इस दौरान बद्वी को रस्सी के सहारे कई फीट ऊंचाई से नीचे की ओर आते देखना अपने आप में रोमांचित करता है.
कई फीट ऊंचाई से फेंकते हैं नीचे
ग्रामीण वीरेन्द्र बताते हैं कि यह अनोखी परंपरा कई सालो से घंटाकर्ण मंदिर में निभाई जाती है. माना जाता है कि सालों से चली आ रही इस परंपरा को निभाने से क्षेत्र में उन्नति बरकरार रहती है. वहीं किसी भी तरह की आपदा से आस-पास के गांव वाले सैदव सुरक्षित रहते हैं, कहते हैं कि इस अनोखी परंपरा में कुछ साल पूर्व जहां काठ के एक घोड़े को भगवान बद्री मानकर बेडा या बद्दी जाति के पुरुष को बिठाकर पहले कई फीट ऊंचाई से रस्सी के सहारे सरपट नीचे को छोड़ा जाता था, इस दौरान कई बार व्यक्ति अपनी जान भी गंवा बैठता था. लेकिन अब परंपराओं में आए बदलाव के बाद काठ के घोड़े में सिर्फ एक लकड़ी (इंसानी पुतले) का इस्तेमाल कर उसे नीचे उतारा जाता है. इस अनोखी परंपरा को गांववासी अभी भी आगे बढ़ा रहे हैं,
प्रवासी भी पहुंचते हैं गांव
जितेंद्र रावत जानकारी देते हुए बताते हैं कि मान्यताओं के अनुसार बद्री भगवान को गांव के सबसे ऊंचे स्थान से सबसे नीचे स्थान तक सकुशलता पूर्वक रस्सी के सहारे नीचे छोड़ा जाता है. जिससे गांव में सुख शांति कायम रहती है. इस बार कुटगी गांव में यह परम्परा निभाई गई. आयोजित बद्वी मेले में प्रवासी ग्रामीण भी पहुंचते हैं व इस अनूठी परंपरा को निभाते हैं. साथ ही ईष्ट देवों से आर्शिवाद लेते हैं.
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FIRST PUBLISHED : May 1, 2024, 12:09 IST










