green manure farming – News18 हिंदी

शशिकांत ओझा/पलामू. आज के समय में किसान अच्छा उत्पादन करने के लिए कई तरह के प्रयोग करते है. इसके लिए किसान अपने खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खाद इस्तेमाल करते है. जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है. इसका असर फसल के उत्पादन पर भी पड़ता है. इसके साथ  मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन भी कम हो गया है. ऐसे में किसान रवि फसल के बाद खेत में हरे खाद की खेती कर सकते है. जिससे खेतों के भौतिक और रासायनिक दसा में सुधार होता है. जिससे फसल उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.

क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार ने बताया कि खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए किसानों को साल में एक बार हरे खाद की खेती जरूर करनी चाहिए. हरा खाद एक प्रकार का दलहनी फसल है जो 45 से 50 दिन में तैयार हो जाता है. इस फसल को तैयार हो जाने के बाद ट्रैक्टर से चलित रोटाबेयर एक कृषि यंत्र है. जिसे तैयार फसल के खेत में चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है. जो वर्षा होने के बाद खेत में सड़ जाता है. अपघटन बढ़ने से मिट्टी के जैविक और रासायनिक गुणों में वृद्धि होती है. इससे खेत में जल धारण करने की क्षमता भी बढ़ जाती है. इसके साथ हीं आने वाले फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश मिलता है. इससे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी बढ़ता है.

खेत में करे ढैंचा की खेती
इसके लिए किसान गर्मी के दिनों में मूंग, उड़द, लोबिया, सनई, ढैंचा और आदि की खेती कर सकते है. जिसमें हरी खाद के लिए सबसे बेहतर ढैंचा को माना जाता है. क्योंकि, यह फास्ट ग्रोइंग होता है. इसमें नाइट्रोजन की मात्रा सबसे ज्यादा होती है. इसके जड़ों में गांठ होता है. जिसमें राइजोबियम के कीड़े होते है. जो तनों की मदद से वायुमंडल से नाइट्रोजन खींचकर जड़ों तक पहुंचाते है. इसकी खेती से मिट्टी को 80-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 15-20 किलोग्राम फॉस्फोरस और 10-12 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर का लाभ मिलता है. जिससे बाद किसान अगली फसल के लिए यूरिया खाद का एक तिहाई भाग कम कर इस्तेमाल कर सकते है. उन्होंने कहा कि इसके फसल से कार्बनिक अम्ल बनते है. जिससे क्षारीय और लवणीय मिट्टी उपजाऊ बन जाती है. ढैंचा की खेती से मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन बढ़ जाती है.

40 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है फसल
उन्होंने आगे कहा कि गेहूं और धान की खेती से खेत की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है. ऐसे में जरूरी है कि किसान मिट्टी के पोषक तत्वों में वृद्धि करने के लिए ढैंचा की खेती कर सकते है. इसके लिए वो गेहूं और धान की खेती के बीच का समय में लगा सकते है. 20 किलो प्रति हेक्टेयर के दर से खेतों में लगा सकते है.ये फसल 40 से 50 दिनों में तैयार हो जाता है. जिसे किसान पलटवाकर मिट्टी में दबा दें. इससे मिट्टी के जैविक, रासायनिक और भौतिक गुणों में सुधार होता है.

मई में करे इसकी खेती
इसकी खेती के लिए किसान मई महीने से जून महीने तक के बीच कर सकते है. इसकी बुआई किसान तब करे जब हल्की वर्षा हो जाए या उनके पास पानी उपलब्ध हो. खेत के पटवन करके सिंचाई के बाद खेत की जोताई करें. इसके बाद इसके बीज का खेत में छिड़काव करेंगे. इसके लिए 10 से 12 किलो प्रति एकड़ के दर से खेत में छिड़काव करे. जब ये 2 फिट के लगभग में तैयार हो जाए तो रोटाबेटर से खेत में इसकी जोताई कर सकते है. इस दौरान मिट्टी में नमी का होना बेहद जरूरी है. जोताई के बाद वर्षा होने से नमी रहने से अपघटन शीघ्र होता है. अगर किसान इसका उत्पादन पाना चाहते है तो इसके लिए उन्हें 150 दिन फसल की देखभाल करनी होगी. अगर किसान इसकी बुआई जून में करते है तो नवंबर के महीने में इसकी कटाई कर सकते है. तबातक फसल तैयार हो जाता है. इससे किसान को 15 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है. किसान इसकी खेती के लिए उन्नत प्रभेद का चयन कर सकते है. कई किसान आते है. जैसे पंजाबी ढैंचा जो की बेहद तेजी से बढ़ती है. एंड डी 137 इसका इस्तेमाल क्षारीय मिट्टी के लिए कर सकते है. इसके अलावा हिसार ढैंचा, पन्त ढैंचा की खेती कर सकते है.

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