कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल.राजशाही के खिलाफ आंदोलन, बलिदान के आपने कई किस्से सुने होंगे. जो आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं. ऐसी ही एक अमिट गाथा आज भी पहाड़ों में गूंजती है. यह कहानी 17वीं सदी की है. उस दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में राजा मेदनी शाह का आधिपत्य था, गांवों के ग्रामीण विभिन्न करों के बोझ तले दब रहे थे, लोगों का शोषण हो रहा था. इस बीच एक युवा असहमति का हाथ खड़ा करते हुए राजशाही के विरूद्व मोर्चा खोल अग्नि कुंड में कूद अपने प्राणों की आहुति दे देता है. जिस बलिदानी युवक को आज भी लोग ‘’पंथ्या दादा’ के नाम से जानते हैं.
पंथ्या दादा के पक्ष्वा (पूर्वज) विमल काला बताते हैं कि 15वीं सदी के दौरान जब राजा अजयपाल ने राजधानी देवलगढ़ बनाई तो सुमाड़ी गांव काला क्षेत्र के ब्राह्मणों को दान में दिया था. यह गांव कर मुक्त था, लेकिन समय के साथ राजा के कई अधिकारी इस व्यवस्था से खुश नहीं थे. ऐसे में राजा मेदनी शाह को सुमाड़ी गांव में भी स्यूंदी व सुप्पा कर लगाने का फरमान जारी कर दिया.
राजा ने लागू किया ‘रोजा’
विमल काला जानकारी देते हुए बताते हैं कि राजशाही द्वारा सुमाड़ी गांव के लोगों पर कर लगाया गया तो गांव वालों द्वारा इसका विरोध किया गया. जिसके बाद राजा ने ‘रोजा’ लागू कर दिया. यानि कर न दिये जाने पर दंड स्वरूप गांव वालों को प्रतिदिन एक परिवार से बलि देने का फरमान जारी कर दिया. इसके लिए सुमाड़ी गांव में राजा के सैनिकों ने गौरा देवी मंदिर के पीछे खेत में एक गड्डा खोदा जहां आग की धुनी लगाई गई. राजा का आदेश था कि बोरे में बंद कर व्यक्ति को आग के हवाले किया जाए, जिससे कि दहशत में अन्य ग्रामीण कर देने के लिए मान जाएं. इसमें सबसे पहले जिस परिवार के एक सदस्य को अपने प्राणों की आहुति देनी थी, वह पंथ्या काला का परिवार था.
अग्निकुंड में कूद दी जान
उस दौरान पंथ्या काला अपनी बहन के यहां श्रीनगर गढ़वाल के निकट फरासू में रहते थे, जिस दिन राजा द्वारा यह फरमान जारी किया गया. उस समय पंथ्यां जंगल में जानवरों को चरा रहे थे, अचनाक यहां पथ्यां की आंख लगी और उन्हें सपने में गौरा देवी ने दर्शन देकर पूरा घटनाक्रम बताया व तत्काल सुमाड़ी गांव निकलने के लिए निर्देशित किया. पंथ्या ने भी जानवरों को घर छोड़ बहन से इजाजत लेकर सुमाड़ी की ओर रात को ही निकल पड़ा. जब देर रात पंथ्या सुमाड़ी गांव पहुंचे तो यहां उन्होंने अपने बड़े भाई व भाभी से मुलाकात की और उन्हें प्राणों की आहुति न देने के लिए कहकर खुद आत्मदाह करने की बात कही. दरअसल पंथ्या काला जब छोटे थे, तब ही उनके माता पिता का देहांत हो गया था. वह अपने भाई व चाची की परवरिश में ही बड़े हुए.
राजशाही के खिलाफ उठाई आवाज
विमल काला बताते हैं कि अगले दिन पंथ्या काला सुबह-सुबह नहा धोकर गौरा देवी की पूजा करने के बाद उस स्थान पर चले गया, जहां अग्निकुंड में जान देनी थी. पंथ्या काला ने वहां ग्रामीणों को राजशाही के तुगलकी फरमान के खिलाफ आवाज उठाने की बात कहते हुए अग्निकुंड में कूद मार दी. यह दुश्य देखते ही पंथ्या काला की चाची भद्रा देवी भी पीछे-पीछे कुंड में कूद गई. थोड़ी देर बाद पंथ्या काला की दोस्त मुक्ती बहुगुणा ने भी कुंड में कूद मारकर जान दे दी. पलभर में आग की तरह यह खबर हर जगह फैल गई. राजदरबार में भी एक साथ तीन लोगों के आत्मदाह की सूचना से राजा को भी बगावत का भय सताने लगा. ऐसे में राजा ने फरमान वापस लेते हुए गांव को कर मुक्त कर दिया. साथ ही प्रतिवर्ष पंथ्या दादा समेत अन्य बलिदानियों की पूजा राज परिवार की ओर से कराने का वचन दिया. आज भी गढ़वाल क्षेत्र में पंथ्या दादा का नाम सम्मान व आदर के साथ लिया जाता है.
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FIRST PUBLISHED : May 3, 2024, 17:24 IST










