“कब तक हम ही तड़पें?” — सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह का सिस्टम पर तीखा सवाल

“कब तक हम ही तड़पें?” — सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह का सिस्टम पर तीखा सवाल

मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह। - Dainik Bhaskar

मानसा, 11 अगस्त — सिद्धू मूसेवाला की हत्या को दो साल से भी ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन उनके पिता बलकौर सिंह का दर्द, गुस्सा और असंतोष कम नहीं हुआ है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक और तीखी पोस्ट साझा की है, जिसमें उन्होंने न केवल न्याय मिलने में हो रही देरी पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सिस्टम की निष्पक्षता, पारिवारिक निजता के उल्लंघन, और जनता की प्रतिक्रिया पर भी नाराजगी जताई है।


“जवाब मायने तभी रखते हैं जब समय पर दिए जाएं”

बलकौर सिंह ने लिखा:

“वे जवाब मायने नहीं रखते जो समय पर न दिए जाएं। पर कानूनी तौर पर हर नागरिक को अपना पक्ष रखने का अधिकार है, लेकिन वह पक्ष कितना निष्पक्ष है, यह अलग बात है।”

उन्होंने यह संकेत दिया कि भले ही लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है, सिस्टम का पक्षपात और देरी, न्याय की उम्मीद को खोखला कर देते हैं।


“कत्ल के बाद भी कातिलों को मंच, हमें चुप्पी मिली”

बलकौर सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि:

“मुझे लगता है कि मेरे बेटे का ही शायद ऐसा कत्ल है, जिसके कातिल तक ने इंटरव्यू किए हैं।”

यह बयान सीधे तौर पर उन अपराधियों पर निशाना है जो हत्या के बाद भी मीडिया या अन्य प्लेटफॉर्म्स पर सामने आए, जबकि पीड़ित परिवार को इंसाफ मांगने पर भी चुप करवा दिया गया।


“हमारे हक की अर्जी को सार्वजनिक किया गया”

बलकौर सिंह ने खुलासा किया कि जब उन्होंने अपना कानूनी हक मांगने की कोशिश की, तो उस प्रक्रिया की निजी जानकारियों को सार्वजनिक कर दिया गया। यह उनके अनुसार परिवार की निजता का घोर उल्लंघन है।


“जब सहने वाले बोलने लग जाएं, तो वे खटकने लगते हैं”

यह वाक्य बलकौर सिंह की पीड़ा और बेबसी का सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने कहा कि जब पीड़ित बोलने लगे, तो उसे भी संदेह की नजर से देखा जाने लगा


“आज हमारी आमदनी पर भी सवाल”

कुछ लोगों द्वारा परिवार की आय पर उठाए गए सवालों पर बलकौर सिंह ने साफ कहा:

“यह मेरी, मेरे परिवार की, और मेरे पुत्र की दिन-रात की तपस्या है… मेरे बच्चे के शब्दों का मूल्य किसी भी अंक में मापा नहीं जा सकता।”

यह बयान सिद्ध करता है कि सिद्धू मूसेवाला की कमाई, उनके काम और शब्दों का सिर्फ आर्थिक नहीं, भावनात्मक और सांस्कृतिक मूल्य भी है।

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