Five Famous Courtesans of the Country: मुगल काल में तवायफों का काम नाचना, गाना और मनोरंजन करना था. ये सिलसिला अंग्रेजों के राज में भी चलता रहा. इन तवायफों को तहज़ीब का स्कूल माना जाता था. समाज के ऊंचे तबके के परिवारों के लड़कों को इनके पास कोठे पर शिष्टाचार सीखने के लिए भेजा जाता था. ताकि वह बड़े होने पर समाज में उठने-बैठने के तौर तरीके सीख सकें. आज भले ही तवायफ होने का मतलब जिस्मफरोशी से जोड़ दिया गया हो, लेकिन असल में तब उनका नाता संगीत, नृत्य, तहजीब, नफासत और कला से जोड़कर देखा जाता था. ऐसी ही कई.तवायफे थीं, जिन्होंने अपने हुनर से लोगों के दिलों पर राज किया. इनके दीवाने राजा-महाराजा और नवाब भी थे. इनके ठाठबाट और आवाज का जादू ही अलग था. इसमें कई मशहूर तवायफें थीं, मसलन – गौहर जान, जद्दन बाई और ज़ोहराबाई. आइए हम आपको बताते हैं ऐसी पांच तवायफों के बारे में…
देश की पहली करोड़पति गायिका गौहर जान
गौहर जान देश की पहली करोड़पति गायिका थीं, लेकिन उनके बचपन की कहानी काफी दर्द भरी है. उन्होंने ना केवल छोटी सी उम्र में माता-पिता का तलाक देखा, बल्कि 13 साल की उम्र में बलात्कार का दर्द भी झेला. गौहर जान का जन्म 26 जून, 1873 को आजमगढ़ में एक क्रिश्चियन परिवार में हुआ था. पहले उनका नाम एंजेलिना योवर्ड था. गौहर के दादा ब्रिटिश थे, जबकि दादी भारतीय थीं. उनके पिता का नाम विलियम योवर्ड और मां का नाम विक्टोरिया था. गौहर की मां विक्टोरिया भी एक प्रशिक्षित डांसर और सिंगर थीं. दुर्भाग्य से उनके माता-पिता की शादी ज्यादा समय तक चल नहीं पाई और 1879 में, जब एंजेलिना सिर्फ 6 साल की थीं उनका तलाक हो गया. इसके बाद विक्टोरिया ने कलकत्ता में रहने वाले मलक जान नाम के शख्स से शादी कर ली और इस्लाम धर्म कबूल कर लिया. मलक जान ने एंजेलिना को गौहर जान नाम दिया.
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भारतीय शास्त्रीय संगीत को शिखर पर पहुंचाने वाली गौहर असल जिंदगी में शोषण का शिकार रही थीं. गौहर जान का 13 साल की उम्र में बलात्कार हुआ था. फिर भी वह इस सदमे से उबरते हुए संगीत की दुनिया में अपना सिक्का जमाने में कामयाब हुईं. समय बीतने के साथ गौहर जान स्थाापित गायिका और नृत्यांगना बन चुकी थीं. साल 1883 में गौहर जान कलकत्ता में नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में नियुक्त हो गईं. गौहर जान ने 1902 से 1920 के बीच बंगाली, हिंदी, गुजराती, तमिल, मराठी, अरबी, पारसी, पश्तो , फ्रेंच और अंग्रेजी समेत 10 से भी ज्यादा भाषाओं में 600 से भी अधिक गाने रिकॉर्ड किए. गौहर जान ने अपनी ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती, भजन और तराना के जरिए हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को दूर-दूर तक पहुंचाया.19वीं शताब्दी में गौहर जान सबसे महंगी सिंगर थीं. ऐसा कहा जाता है कि वो सोने की सौ गिन्नियां लेने के बाद ही किसी महफिल में गाती थीं.
अंग्रेजों से भिड़ने वाली बेगम हजरत महल
बेगम हजरत महल का जन्म एक अफ्रीकी और भारतीय के मिश्रित परिवार में हुआ था. बेगम हजरत महल यानी मुहम्मदी को छोटी उम्र में काम-काज करने के लिए सेविका के तौर पर शाही हरम को बेच दिया गया था. उस दौर में नवाब वाजिद अली शाह ने सुंदर युवतियों को संगीत और रंगमंच की तालीम देने के लिए परीखाना बना रखा था. मोहम्मदी भी इस परीखाना में शामिल कर ली गईं. परीखाना की युवतियां संगीत की तालीम हासिल कर नाच गाने से मनोरंजन करने वाली तवायफें बनतीं. यहां रखी गई सभी युवतियों के नाम में ‘परी’ शब्द जोड़ दिया जाता. इस तरह से मुहम्मदी अब महक परी बन गईं. बेगम हजरत महल की सुंदरता और गुणों से नवाब उन पर फिदा हो गए और उन्होंने महक परी से करार की तरह किया जाने वाला निकाह-मुताह कर लिया. 1845 में बेटा पैदा हो जाने पर उन्हें आधिकारिक पत्नी का ओहदा देने के साथ नया नाम भी मिला- ‘बेगम हजरत महल’.
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अंग्रेजों ने फरवरी 1856 में अवध को अपने अधीन लेने का ऐलान कर दिया और उसी साल मार्च में वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर कलकत्ता भेज दिया. फिर क्या था, 30 मई 1857 को विद्रोहियों ने बेगम हजरत महल की अगुआई में लखनऊ पर कब्जा कर लिया. अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूंकने वाले क्रांतिकारियों ने बेगम हजरत महल के बेटे बिरजिस कद्र को कैसरबाग महल में उसके पुश्तैनी तख्त पर बिठा कर अवध का शासक घोषित कर दिया. बेगम हजरत महल अपने बेटे की संरक्षक घोषित की गईं. बहरहाल, मार्च 58 आते-आते अंग्रेजों ने अपनी ताकत बहुत बढ़ा ली और बेगम को लखनऊ से जाने को मजबूर होना पड़ा. फिर भी उन्होंने बहराइच और गोंडा के राजाओं के सहयोग से अपनी लड़ाई जारी रखी. बेगम हजरत महल ने हथियार नहीं डाले. बल्कि तकरीबन 50 हजार की सेना के साथ नेपाल से शरण मांगी. वहां के शाह के इनकार करने पर अपने साथ लाई दौलत और जेवर देकर अपने लिए इज्जत की जिंदगी का सौदा किया. इस दौरान अंग्रेज उन्हें पेंशन और माफी की पेशकश देकर भारत आने का प्रस्ताव देते रहे. उन्होंने किसी पेशकश को स्वीकार नहीं किया. नेपाल में ही रहते हुए 1879 में उनका देहांत हो गया.
बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं जद्दनबाई
जद्दनबाई मशहूर फिल्म स्टार नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी थीं. जद्दनबाई का जन्म 1892 में हुआ था. जद्दनबाई की मां दलीपबाई तवायफ थीं. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो दलीपबाई का बचपन में तवायफों के एक ग्रुप ने अपहरण कर लिया, जिसकी वजह से उन्हें भी इलाहाबाद में यह काम करना पड़ा. बहुत छोटी उम्र में जद्दनबाई अपने परिवार के साथ कोलकाता शिफ्ट हो गईं. उनकी संगीत की शिक्षा यहीं से शुरू हुई.
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इसकी शुरुआत उन्होंने ठुमरी गायक मोइनुद्दीन से की. इसके बाद जद्दनबाई ने बड़े गुलाम अली खान के छोटे भाई बरकत अली से भी संगीत की तालीम हासिल की. फिल्म इंडस्ट्री में बहुत से कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के दम पर खूब नाम कमाया. उन्हीं में से एक जद्दनबाई भी थीं. यूं तो फिल्मी दुनिया में टिकना आसान नहीं है, लेकिन जद्दनबाई ने सभी चुनौतियों का सामना करते हुए न सिर्फ इंडस्ट्री में पैर जमाए, बल्कि अपनी बेटी नरगिस को भी बड़ी अभिनेत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई.
ज़ोहराबाई के बड़े गुलाम अली भी थे फैन
ज़ोहराबाई को ज़ोहराबाई आगरावाली के नाम से भी जाना जाता है, 1900 के दशक की शुरुआत में ज़ोहराबाई हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली गायिकाओं में से एक थीं. वह भारतीय शास्त्रीय संगीत में तवायफों की गायन परंपरा के अंतिम दौर की गवाह रहीं, जिससे गौहर जान भी आती थीं. गायन की अपनी मर्दाना शैली के लिए जानी जाने वाली ज़ोहराबाई ने ग्रामोफोन कंपनी ऑफ इंडिया के लिए कई गाने रिकॉर्ड किए. ज़ोहराबाई का जन्म 1868 में आगरा में हुआ था. अपने जीवन के शुरुआती वर्षों के दौरान ज़ोहराबाई ने उस्ताद शेर खान, उस्ताद कल्लन खान और प्रसिद्ध संगीतकार मेहबूब खान से संगीत की तालीम हासिल की.
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ज़ोहराबाई की ख़ासियत थी कि उनकी एक से ज़्यादा विधाओं पर पकड़ थी. जिस रवानी से वो ‘ख़याल’ में डूबती-उतरती थीं, उतनी ही सहजता से वो ठुमरी या ग़ज़ल भी पेश किया करती थीं. आगरा घराने का एक बेहद बड़ा नाम फैयाज़ ख़ान उन्हीं की गायिकी से प्रभावित थे. बड़े ग़ुलाम अली ख़ान भी ज़ोहराबाई का ज़िक्र बहुत अदब से किया करते. रिकॉर्ड पर उनकी कोई 78 रचनाएं उपलब्ध हैं.
ईश्वरीय आवाज की मलिका रसूलन बाई
रसूलन बाई बनारस घराने की नुमाइंदगी करती थीं. उनका जन्म 1902 में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था. लेकिन उऩके पास अपनी मां से सीखे गए संगीत की विरासत की दौलत थी. जब वह केवल पांच साल की थीं तभी उन्होंने उस्ताद शमू खान के तालीम लेनी शुरू कर दी थी. यही वजह थी कि रसूलन बाई के गायन की नींव बेहद पुख्ता थी. बाद में वह सारंगी वादक आशिक खान और उस्ताद नज्जू खान के पास भी संगीत सीखने गईं. रसूलन बाई किस स्तर की कलाकार थी यह अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी उनका नाम बेहद ऐहतराम से लेते थे. बिस्मिल्लाह खान का मानना था कि उनकी आवाज में ईश्वर का वास है.
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रसूलन बाई की गाई एक ठुमरी, ‘लागत करेजवा में चोट, फूल गेंदवा ना मारो’ तो इतनी पसंद की गई कि वो यादगार बन गई. आाजादी के बाद बनारस के हालात बदले. लोगों ने तवायफों को शहर से हटाने का आंदोलन चलाया. मजबूरन रसूलन बाई भी उन हालात का शिकार बनीं और बाद में उन्हें बेहद गरीबी के दिन देखने पड़े. उनके शौहर सुलेमान पहले ही पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन वो उसी मिट्टी में मरना चाहती थीं, जिसमें उन्होंने जन्म लिया था.कहा जाता है कि ठुमरी साम्राज्ञी रसूलन बाई ने जिंदगी के आखिरी दिन इलाहाबाद में फुटपाथ पर छोटा मोटा सामान बेचकर गुजारे. इसी मुफलिसी में वह संसार से विदा हो गईं.
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FIRST PUBLISHED : May 3, 2024, 21:15 IST










