पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: मेहरी मालेकी को पीएचडी थेसिस जमा करने के लिए कोई और मौका नहीं
पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में इतिहास विभाग से पीएचडी कर रही ईरानी नागरिक मेहरी मालेकी डिजीचेह के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने छात्रा की ओर से दाखिल दो याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इतने वर्षों और बार-बार दिए गए अवसरों के बावजूद, अब उसे और कोई मौका नहीं दिया जा सकता। मेहरी ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि उसे थीसिस जमा करने के लिए एक और अंतिम मौका दिया जाए, वीजा की अवधि बढ़ाई जाए, ओवरस्टे पर लगे जुर्माने को माफ किया जाए, और भारत में शरणार्थी के तौर पर रहने की अनुमति दी जाए।
मेहरी को 2012 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पीएचडी कोर्स में दाख़िला मिला था, और उसे आठ साल के भीतर शोध कार्य पूरा करने की आवश्यकता थी। हालांकि, कोविड-19 और निजी कारणों का हवाला देते हुए वह निर्धारित समय में थीसिस जमा नहीं कर पाई। विश्वविद्यालय ने सहानुभूति दिखाते हुए उसे 2022 में ‘गोल्डन चांस’ के तहत 30 दिसंबर 2022 तक का अंतिम मौका भी दिया। इसके बावजूद वह रिसर्च जमा करने में असफल रही।
अगला मौका 2025 में देने की बजाय, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इतने वर्षों में बार-बार दिए गए अवसरों के बावजूद छात्रा ने अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं, इसलिए अब उसे और कोई मौका नहीं दिया जा सकता। यूनिवर्सिटी ने 6 मार्च को एक बैठक में उसे 15 दिन का अतिरिक्त समय दिया था, लेकिन छात्रा ने अंतिम तारीख से एक दिन पहले केवल प्रारूप भेजा, जबकि थीसिस की फाइनल जमा प्रक्रिया संबंधित प्राधिकारी के पास होती है।
मेहरी ने यह भी तर्क दिया था कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की ओर से उसे शरणार्थी घोषित किया गया है और भारत सरकार से स्थायी निवास की अनुमति मांगी गई है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की और कहा कि यह मामला भारत सरकार के समक्ष स्वतंत्र रूप से उठाया जा सकता है।
यूजीसी की गाइडलाइंस के अनुसार, पीएचडी की समय सीमा 6 साल होती है, और विशेष परिस्थितियों में 2 साल की अतिरिक्त छूट दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए पुनः पंजीकरण की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब तक दिए गए अवसरों को देखते हुए, मेहरी को और कोई राहत नहीं दी जा सकती।